देहरादून। मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) में उपाध्यक्ष और सचिव के स्तर से अवैध निर्माणों के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाया जा रहा है। ऊपर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की सक्रियता और त्वरित कार्रवाई से जहां अवैध निर्माण करने वालों में हड़कंप है, वहीं प्राधिकरण के ही कुछ निचले स्तर के अधिकारियों की कथित लापरवाही इस पूरी मुहिम पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है।
सहस्रधारा रोड स्थित एक होटल/रेस्टोरेंट परिसर का मामला इसका ताजा उदाहरण बताया जा रहा है। दस्तावेजों के अनुसार, अनधिकृत निर्माण के मामले में MDDA ने 14 नवंबर 2025 को परिसर को सील किया था। बाद में संबंधित पक्ष की ओर से सील खोलने का अनुरोध किया गया।
प्राधिकरण की ओर से जारी आदेश में 07 दिन के भीतर शमन मानचित्र प्रस्तुत कर स्वीकृति कराने की शर्त पर सील खोलने की अनुमति दी गई थी। आदेश में साफ कहा गया था कि निर्धारित अवधि में शमन की कार्रवाई नहीं होने पर निर्माण को दोबारा सील किया जाएगा।
उपाध्यक्ष-सचिव की सख्ती पर नीचे के अधिकारियों ने फेरा पानी?
MDDA के उपाध्यक्ष और सचिव द्वारा जिस तरह प्राधिकरण की कार्यप्रणाली को पटरी पर लाने और नियमों का पालन कराने के लिए सख्ती दिखाई जा रही है, उसकी सराहना की जा रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि शीर्ष स्तर से जारी आदेशों को जमीन पर लागू कराने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों की है, वे आखिर क्या कर रहे हैं?
अगर सात दिन की समयसीमा में शमन मानचित्र स्वीकृत नहीं हुआ, तो दोबारा सीलिंग की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अगर शमन मानचित्र स्वीकृत हो गया, तो उसकी स्थिति क्या है? और सबसे अहम—सील खुलने के बाद परिसर की निगरानी किस अधिकारी की जिम्मेदारी थी?
ऊपर एक्शन, नीचे ‘सेटिंग’ की चर्चा क्यों?
स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि सील खुलने के बाद परिसर में फिर से गतिविधियां शुरू हो गई हैं। ऐसे में सवाल सीधे उन अधिकारियों की कार्यशैली पर जाता है, जिन्हें मौके पर जाकर प्राधिकरण के आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करना था।
उपाध्यक्ष और सचिव अगर लगातार सख्ती बरत रहे हैं तो उनके अधीनस्थ अधिकारी उसी सख्ती को जमीन पर लागू क्यों नहीं करा पा रहे?
यही वह सवाल है जिसका जवाब MDDA के जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।
उपाध्यक्ष-सचिव की छवि पर नीचे के अधिकारियों की लापरवाही भारी?
प्राधिकरण में शीर्ष स्तर पर यदि अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है तो उसका श्रेय निश्चित तौर पर उपाध्यक्ष और सचिव की सक्रिय कार्यशैली को जाता है। लेकिन अगर नीचे के अधिकारी आदेशों की निगरानी और अनुपालन में लापरवाही बरतते हैं, तो इससे कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठता है और ऊपर के अधिकारियों की मेहनत पर भी पानी फिर सकता है।
अब देखना होगा कि MDDA उपाध्यक्ष और सचिव इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधीनस्थ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करते हैं या नहीं।
हालांकि, परिसर में कथित गतिविधियों और अधिकारियों की लापरवाही संबंधी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। MDDA का आधिकारिक पक्ष भी इस मामले में महत्वपूर्ण होगा।
उपाध्यक्ष-सचिव की सख्ती के बावजूद अगर नीचे के अधिकारी आदेशों का पालन नहीं करा पा रहे, तो फिर MDDA में जवाबदेही आखिर किसकी है?
