प्राधिकरणों में प्रतिनियुक्ति और समायोजन का खेल? चार एई और एक एसई के बहाने व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल
देहरादून। उत्तराखण्ड के विभिन्न विकास प्राधिकरणों में वर्षों से चल रही प्रतिनियुक्ति, सेवा विस्तार और समायोजन की व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। चर्चा केवल कुछ अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, सेवा नियमों के पालन और समान अवसर जैसे गंभीर मुद्दों से जुड़ता दिखाई दे रहा है।
सूत्रों के अनुसार विकास प्राधिकरणों में कार्यरत चार सहायक अभियंताओं और एक वरिष्ठ अभियंता की तैनाती एवं सेवा संबंधी प्रक्रियाओं को लेकर कई स्तरों पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इनमें टिहरी विकास प्राधिकरण के पंकज पाठक, एमडीडीए के अभिषेक भारद्वाज एवं शशांक सक्सेना तथा हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण के प्रशांत सेमवाल के नाम प्रमुख रूप से सामने आ रहे हैं।
हालांकि अब तक किसी भी अधिकारी के विरुद्ध किसी न्यायालय, सतर्कता एजेंसी या विभागीय जांच में भ्रष्टाचार अथवा वित्तीय अनियमितता का कोई अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। ऐसे में पूरा विवाद अधिकारियों के कार्यों से अधिक उनकी नियुक्ति और प्रतिनियुक्ति प्रक्रिया को लेकर खड़ा हुआ है।
आखिर विवाद की जड़ क्या है?
प्रश्न यह उठ रहे हैं कि क्या इन अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति नियमानुसार हुई? क्या उनके मूल विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त किया गया था? क्या कार्मिक विभाग और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति ली गई थी? और यदि प्रतिनियुक्ति अवधि समाप्त होने के बाद सेवा विस्तार दिया गया तो वह किस नियम के तहत दिया गया?
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिनियुक्ति अपने आप में कोई अवैध व्यवस्था नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें वर्षों से विभिन्न विभागों में विशेषज्ञ अधिकारियों की सेवाएं प्रतिनियुक्ति के माध्यम से लेती रही हैं। लेकिन जब प्रतिनियुक्ति लंबी अवधि तक जारी रहती है या समायोजन की स्थिति बनती है, तब पारदर्शिता और नियमों के पालन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है।
पुराने समायोजन भी बहस के केंद्र में
जानकारों का कहना है कि पूर्व में सिंचाई विभाग से आए कुछ अभियंताओं के विकास प्राधिकरणों में समायोजन होने की चर्चाएं भी समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यदि पहले समायोजन हुए थे तो क्या लोक सेवा आयोग से परामर्श लिया गया था? क्या कार्मिक विभाग की अनुमति प्राप्त थी? और क्या उस समय अन्य पात्र अधिकारियों को भी समान अवसर दिया गया था?
यही कारण है कि अब पुरानी फाइलों और आदेशों को भी खंगाले जाने की मांग उठ रही है।
प्रतिनियुक्ति विवाद के बीच हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण में सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर के रूप में कार्यरत रहे राजन सिंह का नाम भी चर्चा में है। प्रशासनिक हलकों में उनकी प्रतिनियुक्ति अवधि, सेवा विस्तार और अनुमोदनों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हालांकि इन प्रश्नों का उत्तर केवल शासनादेशों, विभागीय अभिलेखों और अधिकृत दस्तावेजों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकता है। बिना दस्तावेजी साक्ष्य किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं माना जा सकता।
पूरा विवाद अब एक बड़े नीति संबंधी प्रश्न में बदलता दिखाई दे रहा है। एक पक्ष का तर्क है कि विकास प्राधिकरणों में नियमित भर्ती कर युवाओं को अवसर दिया जाना चाहिए। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि मास्टर प्लान, शहरी नियोजन, भूमि प्रबंधन और बड़े निर्माण कार्यों के लिए अनुभवी अधिकारियों की आवश्यकता होती है, जिसे प्रतिनियुक्ति के माध्यम से पूरा किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि व्यवस्था का स्थायी समाधान नियमित भर्ती और आवश्यकता आधारित प्रतिनियुक्ति के संतुलित मॉडल में ही निहित है।
इस पूरे प्रकरण के दौरान कुछ समाचार माध्यमों पर बिना पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्यों के अधिकारियों को निशाना बनाने के आरोप भी लगे हैं। प्रशासनिक मामलों के जानकारों का कहना है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करना जांच एजेंसियों और न्यायालय का अधिकार क्षेत्र है।
अब आम जनता यह जानना चाहती है कि—
- विकास प्राधिकरणों में कुल कितने अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं?
- कितने अधिकारियों को सेवा विस्तार दिया गया?
- किन मामलों में समायोजन हुआ?
- क्या सभी मामलों में एक समान नियम लागू किए गए?
- क्या इन सभी आदेशों को सार्वजनिक किया जाएगा?
चार सहायक अभियंताओं और एक वरिष्ठ अभियंता के नाम भले ही चर्चा में हों, लेकिन असली मुद्दा उत्तराखण्ड के विकास प्राधिकरणों में प्रतिनियुक्ति नीति, समायोजन प्रक्रिया, पारदर्शिता और समान अवसर का है। यदि यह मामला न्यायालय की चौखट तक पहुंचता है तो संभव है कि जांच का केंद्र यही प्रश्न बने कि क्या सभी अधिकारियों के मामलों में एक समान नियम लागू किए गए और क्या पूरी प्रक्रिया विधिसम्मत एवं पारदर्शी रही।
