पिता के ऊपर एक मर्मस्पर्शी कविता…….”पिता, क्या लिखूं तुम्हारे लिए”पिता

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क्या लिखूँ तुम्हारे लिए,
कभी जो समझ ना आये,
आया बस इतना ही समझ,
करते रहे समझौते,
हमारे लिए,
अपनी ख़ुशियों का,
अपनी इच्छाओं का,
करते रहे दमन,
पता नहीं कैसे कंधे हैं,
कभी थकते ही नहीं,
बोझ उठाते,
पिता,
पीता है हलाहल,
शिव की तरह,
कल्याण हेतु करने को,
उत्सर्जन प्राण सतत,
जब डाँटते थे,
तो लगता था बुरा,
कि क्यों टोकते हो
हर बात पर ?
ज़रा सी ग़लती पर,
देते हो इतनी सज़ा,
हो कितने निष्ठुर ?
कभी नहीं आती दया ?
आख़िर हमारी इच्छाओं का,
नहीं है कोई मूल्य,
हर बात में निर्णय,
क्या उन्हीं का अधिकार है ?
उनके अपने सपनों को,
पूरा करने का माध्यम,
क्या हम हैं ?
इन सारे सवालों का ,
जवाब ढूंढ़ते-ढूंढते,
बीत गया बचपन,
संघर्ष के युवा दिनों में,
जब संकल्पों को तोड़ने,
आईं आँधियाँ,
तब समझ आया कि
क्यों जज्बातों को मारना
सिखाया था,
क्यों अपनी डांट के,
रक्षा कवच से,
बनाया था इतना मजबूत,
वो उनकी निष्ठुरता नहीं,
एक पत्थर को,
एक भव्य मूर्ति बनाने का ,
उनका शिल्पकर्म था,
एक ऐसा शिल्पी,
जो जानता था कि,
बिना चोट मारे,
बन ही नहीं सकती
सुंदर मूर्ति,
निर्णय ज्ञान से नहीं,
लिए जाते हैं अनुभवों से,
क्योंकि ज्ञान किताबी है,
और अनुभव,
संसार की वास्तविकता
का परिणाम,
इसलिए उनका हर निर्णय,
जो लगा था,
उस समय गलत,
हुआ सही साबित,
वक़्त के साथ-साथ,
वे अपने सपने लादते नहीं थे,
बल्कि दिखाते थे सपने,
ताकि कहीं हम,
विश्राम की अंधी गलियों में
खो न जाएं,
आज जब पिता बना,
तो जाना,
हर पिता ऐसा ही होता है,
क्योंकि उसके पास,
सन्तान के सृजन,पुष्पन,
पल्लवन का होता है,
असीम उत्तरदायित्व,
इसलिए नहीं बैठ सकता वो,
कभी चैन से,
आज जाना,
कि मेरे पिता सही थे,
हर कदम पर,
क्योंकि उन्हीं के,
नक़्शे-क़दम पर चलकर ही,
उठा पा रहा हूँ,
इस उत्तरदायित्व को,
वरना कब के झुक चुके होते,
मेरे कंधे,
जैसे-जैसे बीत रहा है वक़्त,
और आ रही है,
जिंदगी की साँझ नज़दीक,
त्यों-त्यों जान पा रहा हूँ,
कि कितना महान
होता है पिता,
क्योंकि पिता ही,
पीता है हलाहल,
चलता है,
अनवरत,
अथक,
अप्रतिहत ।।”

– डॉ. श्याम ‘अनन्त’
असिस्टेंट कमिश्नर,
राज्य कर ,नोएडा

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