देहरादून:
जैसे-जैसे कथित अनियमितताओं का भांडा फूटता जा रहा है, वैसे-वैसे एक चर्चित “रीलबाज” IAS अधिकारी की बेचैनी भी खुलकर सामने आने लगी है। ताजा घटनाक्रम में आरोप है कि फर्जी मुकदमे दर्ज करवाकर पहले दबाव बनाने की कोशिश की गई, लेकिन जब बात नहीं बनी तो अब पत्रकारों की आवाज दबाने के लिए शासन स्तर पर पत्राचार शुरू कर दिया गया है।
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में एक पत्रकार द्वारा लगातार खुलासे किए जा रहे थे, जिससे अधिकारी की कार्यशैली और फैसलों पर सवाल खड़े हो रहे थे। इन खबरों से घबराए अधिकारी ने पहले कानूनी दांव-पेंच का सहारा लिया, लेकिन जब मामला उल्टा पड़ने लगा तो अब खबरों को रुकवाने के लिए शासन को पत्र लिखकर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।
फर्जी मुकदमे ने बढ़ाई मुश्किलें
जानकारों का कहना है कि जिस तरह से फर्जी मुकदमे का सहारा लिया गया, उसने अधिकारी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। पत्रकार पक्ष का आरोप है कि यह पूरा कदम केवल सच को दबाने और डराने की नीयत से उठाया गया था। हालांकि, अब यही रणनीति अधिकारी के लिए भारी पड़ती दिख रही है।
शासन तक पहुंचा मामला, लेकिन सवाल बरकरार
शासन को लिखे गए पत्र में खबरों को “भ्रामक” बताते हुए कार्रवाई की मांग की गई है, लेकिन इससे उल्टा यह सवाल खड़ा हो गया है कि यदि सब कुछ सही है तो खबरों से डर क्यों?
हाईकोर्ट जाने की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक, यदि जल्द निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो मामला हाईकोर्ट तक ले जाया जाएगा। पत्रकार पक्ष का साफ कहना है कि वे पीछे हटने वाले नहीं हैं और पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग करेंगे।
पत्रकारों में रोष
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पत्रकारों में भी रोष देखने को मिल रहा है। इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया जा रहा है और कहा जा रहा है कि अगर ऐसे मामलों में कार्रवाई नहीं हुई तो यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत होगी।
आगे क्या?
अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि शासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या सच सामने लाने वालों को संरक्षण मिलेगा या दबाव की राजनीति हावी रहेगी।
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